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भोरमदेव में आस्था के साथ ऐसा व्यवहार क्यों? वायरल वीडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल ।


कवर्धा-भोरमदेव मंदिर में बीते सोमवार को सामने आए एक वायरल वीडियो ने श्रद्धा, व्यवस्था और पुलिस के व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में कथित तौर पर पुलिसकर्मी और राजस्व कर्मचारी मंदिर की सीढ़ियों पर मौजूद कांवड़ियों और श्रद्धालुओं को पीछे हटाते और नीचे की ओर धकेलते नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आस्था के इस पवित्र स्थल पर श्रद्धालुओं के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया गया?


मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ये कोई सामान्य श्रद्धालु या पर्यटक नहीं थे। ये वे कांवड़िए थे, जो मां नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से करीब 150-200 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर अपने कांवड़ में पवित्र जल लेकर भोरमदेव पहुंचे थे। लंबी पदयात्रा, तपती सड़कें, थकान और कठिन रास्तों के बावजूद इन श्रद्धालुओं ने अपना संकल्प पूरा किया और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने मंदिर की सीढ़ियां चढ़ीं।


लेकिन वायरल वीडियो में जो दृश्य दिखाई दे रहा है, उसने इस पूरी आस्था यात्रा पर ही एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।


क्या व्यवस्था का मतलब श्रद्धालुओं को धकेलना है?

भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस की जिम्मेदारी है। मंदिर में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि भीड़ नियंत्रण और श्रद्धालुओं के साथ कथित दुर्व्यवहार के बीच की सीमा आखिर कहां है?


अगर किसी स्थान पर भीड़ अधिक हो गई थी, तो पुलिस के पास श्रद्धालुओं को व्यवस्थित करने के कई तरीके होते हैं-बैरिकेडिंग, कतार व्यवस्था, प्रवेश-निकास का अलग मार्ग, अतिरिक्त जवानों की तैनाती और स्पष्ट दिशा-निर्देश।


लेकिन यदि वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा व्यवहार वास्तविक घटना को सही तरीके से दर्शाता है, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और धार्मिक आस्था के सम्मान का सवाल भी बन जाता है।



150-200 किलोमीटर चलकर आए थे... कुछ कदमों पर क्यों धक्का दी गई आस्था?


कल्पना कीजिए-एक श्रद्धालु अमरकंटक से कांवड़ लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलता है। रास्ते में थकान सहता है, कष्ट सहता है और मन में सिर्फ एक संकल्प रखता है कि भोरमदेव पहुंचकर भोलेनाथ का जलाभिषेक करेगा।


और जब वह अपने गंतव्य तक पहुंचता है, तब मंदिर की सीढ़ियों पर उसे पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़े,तो उसके मन में क्या गुजरेगी?


क्या पुलिस व्यवस्था इतनी कठोर हो सकती है कि आस्था की भाषा ही पीछे छूट जाए पुलिस प्रशासन को देना चाहिए जवाब?


वायरल वीडियो को लेकर पुलिस प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वीडियो कब का है? उसमें दिखाई दे रहे पुलिसकर्मी कौन हैं? उस समय वहां क्या परिस्थिति थी? भीड़ कितनी थी? श्रद्धालुओं को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या श्रद्धालुओं के साथ बल प्रयोग या धक्का-मुक्की के निर्देश दिए गए थे?


इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।


क्योंकि यदि पुलिस का पक्ष सही है और भीड़ के कारण कोई अप्रिय स्थिति बनने का खतरा था, तो प्रशासन को पूरी परिस्थिति जनता के सामने रखनी चाहिए। वहीं यदि किसी पुलिसकर्मी ने निर्धारित सीमा से आगे जाकर श्रद्धालुओं के साथ अनुचित व्यवहार किया, तो उस पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।


भोरमदेव सिर्फ एक मंदिर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है


भोरमदेव को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु सिर्फ एक पर्यटक नहीं होता। उसके लिए यह स्थान भगवान शिव की पवित्र भूमि है। ऐसे में पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि व्यवस्था के साथ श्रद्धा का सम्मान बनाए रखना भी है।


कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों में पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। एक ओर सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, तो दूसरी ओर श्रद्धालुओं के साथ संयम और संवेदनशीलता की अपेक्षा भी रहती है।


सवाल सिर्फ एक वायरल वीडियो का नहीं...


यह मामला केवल इस बात तक सीमित नहीं होना चाहिए कि वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। असल सवाल यह है कि हम धार्मिक आयोजनों में व्यवस्था और संवेदनशीलता के बीच संतुलन कब सीखेंगे?


अगर पुलिस व्यवस्था के नाम पर श्रद्धालुओं को धकेलती नजर आए और श्रद्धालु व्यवस्था के नाम पर अपमानित महसूस करें, तो फिर सवाल उठेगा ही
क्या भोलेनाथ के दरबार तक पहुंचने के लिए कांवड़ियों को सैकड़ों किलोमीटर की कठिन यात्रा से ज्यादा कठिन परीक्षा मंदिर की सीढ़ियों पर देनी होगी?
अब जरूरत है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, वायरल वीडियो की वास्तविकता और पूरी घटना का संदर्भ सामने आए और यदि किसी स्तर पर गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय की जाए।
क्योंकि कांवड़िए सिर्फ जल लेकर नहीं आए थे, वे अपनी आस्था लेकर आए थे। और आस्था को व्यवस्था चाहिए अपमान नहीं।

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